15 अगस्त - Amar Ujala Kavya
जकड़ गुलामी की जंजीरें कसती और नसाती हैं खींच खींच के लहू रगों से रंग रोगन करवाती हैं आर्त वेदना चीख में उनको खुशी झूम के आती है चीरहरण तो चीर से होता चीर. Read more hindi poetry, hindi shayari, hindi kavita on amar ujala kavya.